Wednesday, September 26, 2018

आत्मा

आज रफ़्तार ज़िन्दगी, में थम सा गया हूँ
मेरे तजुर्बे चीख रहे, मै खामोश हो गया हूँ
कुछ गुनाहो तले दबके,दम खुशियों ने जो तोड़ा
मै तो ज़िंदा दिखु , पर आत्मा से मर गया हूँ।

Sud.

Tuesday, January 19, 2016

ढाई अक्छर

बिलखते देखा है मुद्दतो तक, किसी को कब्र पे,
चिताओं पे बस एक बार रोते है सब। 
कफ़न वो रोज़ जाके बदलते हैं उनके कब्र पे,
चिताओं पे तो बस, मुर्दे बदलते है। 
शहादत वो देते हैं गैरों के घरो को तबाह करके,
हम तो दहलीज़ की हिफाज़त में मरे है। 
पढ़ना जिन्हे आता नहीं, कुराने-शरीफ सुनाते है,
हम तो बस ढाई अक्छर में कहानी लिख जाते है। 

Friday, July 3, 2015

मन क्या कहता हैं!!!

दिल मे ये प्यास बड़ी बुरी हैं
की एक आग से बुझी हैं 
धडकनो के सन्नाटे सुने हैं 
खामोसी के शोर सही हैं 
डूब जाना था जीस बूंद में 
बूंद मिट्टी में जा वो मिली हैं 
कैहने को फ़साने बहुत है 
बस मेरी खामोशी सही हैं 

तिनको में कही कल भिखरा पड़ा था 
आज हवाओं  में जा मिला हूँ 
बादलो की आगोश में बैठ के 
फिर से कही बरस रहा हूँ 
मै आइना हूँ खुद का 
अपनी परछाई ढूंढ रहा हूँ 

Tuesday, October 7, 2014

क्यों रोती ये जनता!!!

क्यों रोती ये जनता, क्या रोना ही अब काम हैं 
कभी कोई चीज़, तो कभी किसी का नाम हैं
रो रही हैं जनता, रोना ही बस काम हैं 

रो रहे हैं हम, क्यु बाड़ हैं इत्ती आई
रो रहे हैं हम, क्यों सूखे ने जान खाई 
रोये थे क्या तबभी, जब पेड़ो को काटा था,
रोये थे क्या तबभी, जब तालाबों को बहाया था,

क्यों रोती ये जनता, क्या रोना ही अब काम हैं 
कभी कोई चीज़, तो कभी किसी का नाम हैं
रो रही हैं जनता, रोना ही बस काम हैं 

रोते हैं हम जब, इज़्ज़त किसी की लुटती हैं
रोते हैं हम जब, सजा वो नेता पाता हैं
क्या रोये थे हम, जब इज़्ज़त किसी की छेड़ी थी
क्या रोये थे हम, जब चोर नेता को जिताया था

क्यों रोती ये जनता, क्या रोना ही अब काम हैं 
कभी कोई चीज़, तो कभी किसी का नाम हैं
रो रही हैं जनता, रोना ही बस काम हैं 

रोते हैं सब तब, जब मांगे कोई घूंस हैं 
रोते है सब तब, जब चोरी कुछ हो जाता हैं 
क्या रोये थे तब, जब दहेज़ हमने माँगा था 
क्या रोये थे तब, कला धन छुपाया था 

क्यों रोती ये जनता, क्या रोना ही अब काम हैं 
कभी कोई चीज़, तो कभी किसी का नाम हैं
रो रही हैं जनता, रोना ही बस काम हैं 

Friday, June 13, 2014

वो !!

एक रात की उमीद हैं मेरी, तेरी याद 
एक सुबह का ख़्वाब, तेरा साथ,
सोचा करू तुझको तो ख़ुशी हैं तेरा नाम 
देखलु तुझे तो ज़िंदगी तेरी बात

पूछे तुझे तो खुलती हैं आँखे।   
चाहुँ तुझे तो चलती हैं साँसे 
साथ तेरा धड़कन बन जाती है 
शाया तेरा मेरी रूह बन जाती हैं 

वो !!

Tuesday, June 3, 2014

फुटपाथ !

एक फुटपाथ का वो छोटा सा कोना,
जंहा कभी उसने सुरु किया था रोना 
दिन में जो थाल बनती, और रात में बिस्तर 
जिसपे खुद जीना सीखा उसने आँशु पीकर 
आज वो फुटपाथ बिक गयी हैं,
ज़िंदगी फिर से उसी मोड़ रुक गयी है 
एक वो थे जिन्होने मोल न समझा था उसका 
और एक वो है जो आज मोल लगा रहे उसका 

Friday, May 30, 2014

ख्वाहिशों की दौड़ में, ज़ज़्बात खो गए
मंज़िलों की फ़िक्र में, राह छूट गए 
मशगूल थे जुटाने को ज़िंदगी हम, और  
मुख्तलिफ सी ज़िंदगी, आँखे बंद ज़ी गए ।

Tuesday, May 13, 2014

ऐ राही !!

राह में बैठा क्या सोचे राही, राह कहां ये जांनीं हैँ।
जो तू सोचे राह चलेगी, ये चाह तेरि बैमानि हैँ ।
मंज़िल से क्यो दूर खड़ा तु, मंज़िल खुद न आनीं हैँ ।
जो पग को तु सफ़र बनाले, मंज़िल तुझको पानि हैँ।


Sunday, May 11, 2014

एह्शास

एक लाश पड़ी देखि मैने आज,
काडी धुप मे तड़प्ते।
जान तो नहि थी उसमे
पर आँखे जैसे बोलना चाहती।
एक पल पहले हि देखा था उसको
खुश था ज़िंदगी से शायद
पर जाने कौन सा गम था
मार गया उसको लम्हों मे ।
अगले ही पल हैरान खड़ा
मै लाश ढ़ूंढ रहा था
दफना दिया था उसको
मेरे वक़्त ने आगे बढ़कर
अब तो याद भी नहि
कितनो को तो मैंने खुद
क़त्ल किया हैं हर रोज़ ।






Friday, March 14, 2014

क्यो साल यंहा मुझे होली खेलनी नहीं!

क्यो साल यंहा मुझे होली खेलनी नहीं!

चुनावो में रंगा  हैं ये देश, पर रंग किसीका मिलता नहीं
कौन सच्चा, कौन झूठा  भेद किसीका खुलता नहीं 
बैठ चौराहो पे देदे धरना, पर बात कोई सुनता ही नहीं 
वादे तो बहुत हैं उनके, पूरा किसीका होता नहीं। 

क्यो साल यंहा मुझे होली खेलनी नहीं!

कर रहा देश का नाम कोई, कोई बदनामी से डरता नहीं,
सम्मान जिसका लुट चूका था, बात उसकी कोई सुनता नहीं 
मरना तो था जिन्हे सीमाओ पे, घरो में वो बचते ही नहीं 
बेच खाया देश को, वो गद्दार क्यों मरते नहीं,

क्यो साल यंहा मुझे होली खेलनी नहीं!

क्या है ये धर्म उसका, खुद का कोई देखता नहीं,
क्या है ईश्वर, क्या है अल्लाह, जनता उसको ही नहीं,
मांगते हैं सब ही उससे, मानता उसकि ही नहीं,
मर चुको को पूछते हैं, जिन्दो को कोई पूछता ही नही  

क्यो साल यंहा मुझे होली खेलनी नहीं!

वैसे तो बहाने बहुत हैं पास मेरे 
रंगों में रंग अब घुलता नहीं 
एक भाई दुसरे से मिलता नहीं 
मिलते हैं तन, मन मिलते ही नहीं 
रंगों से सजी ज़िन्दगी, बेरंग जहाँन देखता नहीं 
क्यो साल यंहा मुझे होली खेलनी नहीं!
क्यो साल यंहा मुझे होली खेलनी नहीं!

Monday, February 24, 2014

चाह

तश्वीर देख उसे तोड़ देते हैं, मंज़िल मिले तो राह मोड़ देते हैं।
मुकम्मल नहीं वो खयालात हो, मंज़िल वो जिससे न मुलाकात हो।
खयालो में रहना सुकून देता हैं, नयी राहे बनाना जुनून देता हैं।
अधूरा रखना चाहता हूँ खुदको, वो मुझे ज़िंदा रहने कि चाह देता हैं।

Thursday, December 19, 2013

बुलबुले .....!!!!

उगते हैं बुलबुले आज हवाओ में,
खिलते हैं बुलबुले आज घटाओ में,
बनाके आँधी सी ये सूरत, घुल रहे फिजाओ में है।

मन में सबके ये भरे थे, बुलबुले जो खिल रहे,
देख बढ़ता दुसरो को, बुलबुले ये छोड़ते,
बुलबुलो में जो भरा है, वो हवा पुरानी हैं,
मान इनको मोती सा, पास रखना नादानी हैं।

उगते हैं बुलबुले आज हवाओ में,
खिलते हैं बुलबुले आज घटाओ में,
बनाके आँधी सी ये सूरत, घुल रहे फिजाओ में है।

नाम और बदनाम के, सुबह और शाम के
इस वतन के वास्ते, उस वतन के बुलबुले
बात और विचार के, अपने शिष्टाचार के,
गोलियों और तोप से भी बने थे बुलबुले

उगते हैं बुलबुले आज हवाओ में,
खिलते हैं बुलबुले आज घटाओ में,
बनाके आँधी सी ये सूरत, घुल रहे फिजाओ में है।

बुलबुला इक युं उगा था, देश को बदलने का,
क्या पता था बुलबुलो को बैठे तीरंदाज़ थे,
हर बुलबुले का हाल हैं वो, जैसे पैर के धूल का,
पर बुलबुले जो घुल चुके, वो फ़िज़ा में खिल रहे।

 उगते हैं बुलबुले आज हवाओ में,
खिलते हैं बुलबुले आज घटाओ में,
बनाके आँधी सी ये सूरत, घुल रहे फिजाओ में है।

बुलबुले तो बुलबुले हैं, बस पल दो पल का साथ था। 

Sunday, November 24, 2013

"तन्हाई"

आज फिर मुझे याद आयी, अपने बिछड़े यार कि,
आज फिर मुझे एह्सास हुआ, उससे अपने साथ कि,
एक अर्सा साथ गुजारा था, फिर पास उसे बुलाया हैं 
दोस्तों कि भीड़ में, "तन्हाई" नाम उसने बनाया हैं.


Saturday, November 23, 2013

जिंदगी कि दास्तां

लिखा था किसी ने लहू से, रेत पे जिंदगी कि दास्तां 
भूल गया था वो फितरत, रेत और वक़्त का बदलना
लिखा तो था दर्द दिल का, पर खुशियों  ने जगह लेली
पाये थे  जंहा काँटों के निशा, फूलो को सींचा लहू से था 

Sunday, November 17, 2013

आहिस्ता आहिस्ता। ....

कभी भूली बिसरी यादो में,
कभी बिखरे से जज़बातो में,
कभी आँखों के किसी कोने में,
पर अक्सर लम्हे वो चले आते हैं। 

हम लेटा करते थे ज़मी पे,
तारो को आसमा से लाने को। 
आवारा घूमते बादलो से,
पानी निचोड़ लाने को। 

पल दो पल में पाना चाहा था,
हर ख़ुशी हर अर्मान को। 
ज़िंदगी में रफ़्तार को,
फिर मौत के फर्मान को। 

सोचते थे है सब हममें,
कुछ कर दिखने को। 
डरते नहीं थे आंधियो से,
आसमां को चीर जाने को। 

पर ज़िंदगी को प्यार था शायद,
प्यार था उसे मुझसे बेइंतहा 
मुझमे जो समां गयी चुपके से 
कि अब जी रहा हूँ मै उसको,

आहिस्ता आहिस्ता। ....  

Tuesday, September 17, 2013

निर्माण

कर रहे निर्माण हम देश के भविष्य का।
कर रहे निर्माण हम देश के भविष्य का।
देश को ही बेच कर कर रहे निर्माण हैं
देश को ही लूट कर कर रहे निर्माण हैं

बाटते हैं जमी को, बाटते इंसान हैं
ज्ञान और धर्म को, बाटते अज्ञान से।
धर्म को ना मानते, बाटते ये जात हैं
कोई ऊँचा कोई नींचा, बाटते सम्मान हैं।

कर रहे निर्माण हम देश के भविष्य का।
कर रहे निर्माण हम देश के भविष्य का।

लुट गई है आबरू, लुट गया इमान हैं,
औरते जूती है पैर की, नर को नर का दर्प है ।
देवियों को पूजता, पत्थरों का सम्मान हैं
जिंदा है जो वो नारी, उसकी ज़िन्दगी नर्क हैं।

कर रहे निर्माण हम देश के भविष्य का।
कर रहे निर्माण हम देश के भविष्य का।

कहने को तो चाँद पे जाने को तैयार हैं
ये ज़मी को खो रहे, इसका ना हीं ज्ञान हैं
आज को तो खो रहे, कल से हैं अनभिज्ञ भी
पूर्वजो ने जो किया, उसका पर अभिमान हैं

 कर रहे निर्माण हम देश के भविष्य का।
कर रहे निर्माण हम देश के भविष्य का।

वोटआउट एट इलेक्शन

Vote tera le legi
Jaan teri le legi
Imaan tera le legi
O Shila teri.. hey!
O Shila teri.. hey hey!
O Shila teri le legi
Tu likh ke le le… hey hey…
O Shila teri le legi
Tu likh ke le le

Ek Shilanyas kardegi… hey hey hey!
Vaade woh phenkegi… hey hey hey!
Arey ek Shilanyas kardegi
Vaade woh phenkegi
Iraade badal degi
O Shila teri le legi tu likh ke le le
O Shila teri le legi tu likh ke le le

Sheesha-e-vaade ye uchhaale
Tewar hain iske niraale
Arey dekhe toh ghotale kar de
Kabhi kabhi kaam kar de
Lut.te phire dilliwale
Naa jaane kya kar degi
O Shila teri le legi tu likh ke le le
O Shila teri le legi tu likh ke le le

O Shila ki nazarein nasheeli
O har ek adaa hai rangeeli
Aisi tedhi chaal hai tauba
paise se maalamal hai tauba
Uff ye Umar saath ki holi
Qayamat hi kar degi
O Shila teri le legi tu likh ke le le
Hey hey hey…!
O Shila teri le legi tu likh ke le le..

Vote tera le legi
Jaan teri le legi
Dilli tera le legi
Jaan teri le legi
Imaan tera le legi

O Shila teri le legi tu likh ke le le
Hey hey hey…
O Shila teri le legi tu likh ke le le
Hey hey hey…
O Shila teri le legi tu likh ke le le


Monday, September 16, 2013

बेगाना !!!

कर गए हम कई गुनाह, मेरे अपनों के प्यार में
और मेरे अपनों ने ही, मुझे गुनहगार बता दिया 
अपनों के लिए खुशियाँ, अपने लिए गम को चुना
और मेरे अपनों ने ही, मुझे गुमराह बता दिया 

खुद को तो हम कबका मार चुके थे,
पर मेरे अपनों ने कफ़न अब लपेटा 
जिन्दा तो बस अब ये नाम रहा 
वरना अपनों ने तो मुर्दा बता दिया

गैरों से नहीं रक्खा वास्ता, अपनों को वक़्त दे सकु, 
पास आने पे अपनों ने ही, मुझे बेगाना बना दिया 

Sunday, August 4, 2013

Happy Friendship Day!!!

दोस्ती की कमीनियत की यादो में 
आज दोस्तों की याद सभी को आई
किसी को अपने इटली के दोस्तों की 
तो किसी को इडली खाने वालो की 
किसी चारे वाले को बेजान खालो की
किसी ने राम को अपना दोस्त बनाया 
तो किसी ने रमजान मनाने वालो को 
पर दोस्ती उनकी मतलबी थी निकली 
पिछली बार दोस्ती की कसमे खा के 
याद न किया सालो ने सालो तक 
अब जब कब्र लगी है खुद की खुदने 
तो खुदा की कसमे खाली है सबने

कोई अमीरों की दोस्ती निभा रहा हैं 
कोई गरीबो को दोस्त बना रहा हैं 
कोई राम को अपना दोस्त बता रहा है 
कोई सेक्युलर के वादे बता रहा हैं 

पर हम आप तो ये जानते हैं 
दोस्ती ये पैसे से ही मानते हैं 
दो पैसे देके आज ये आपको 
दोस्ती की कसमे ये खायेगे 
कल को आपके पैसो के साथ 
उम्मीदे भी ले कही छुप जायेंगे 

तो मानो पुराने बुजुर्गो का कहना 
दोस्ती सोच समझ के ही करना 
दोस्ती उससे जो सिर्फ साथ दे
मुसीबतों में जो मौत को भी मात दे
बाकी अब क्या कहे आपसे
Happy Friendship Day!!!!

Thursday, August 1, 2013

मौसेरो का धंधा!!!

बैठ मौसेरे सारे भाई, संसद को चलाते हैं 
बस अपना धंधा, अपना नाम चमकाते हैं 
कोई रोके कोई टोके तो रस्ते पे आ जाते हैं 
बोले हमरा धंधा, कानून हम ही बनाते हैं 

कसकी इतनी औकात, जो हमको सिखलाये 
जाए पहले मेरे असल बाप को ढूंड के लाये 
हम धंधा करने आये हैं चाहे जितने कमाए
कम पड़ा था हमको तो, माँ को बेच ही आये