Tuesday, January 19, 2016

ढाई अक्छर

बिलखते देखा है मुद्दतो तक, किसी को कब्र पे,
चिताओं पे बस एक बार रोते है सब। 
कफ़न वो रोज़ जाके बदलते हैं उनके कब्र पे,
चिताओं पे तो बस, मुर्दे बदलते है। 
शहादत वो देते हैं गैरों के घरो को तबाह करके,
हम तो दहलीज़ की हिफाज़त में मरे है। 
पढ़ना जिन्हे आता नहीं, कुराने-शरीफ सुनाते है,
हम तो बस ढाई अक्छर में कहानी लिख जाते है। 

Friday, July 3, 2015

मन क्या कहता हैं!!!

दिल मे ये प्यास बड़ी बुरी हैं
की एक आग से बुझी हैं 
धडकनो के सन्नाटे सुने हैं 
खामोसी के शोर सही हैं 
डूब जाना था जीस बूंद में 
बूंद मिट्टी में जा वो मिली हैं 
कैहने को फ़साने बहुत है 
बस मेरी खामोशी सही हैं 

तिनको में कही कल भिखरा पड़ा था 
आज हवाओं  में जा मिला हूँ 
बादलो की आगोश में बैठ के 
फिर से कही बरस रहा हूँ 
मै आइना हूँ खुद का 
अपनी परछाई ढूंढ रहा हूँ 

Tuesday, October 7, 2014

क्यों रोती ये जनता!!!

क्यों रोती ये जनता, क्या रोना ही अब काम हैं 
कभी कोई चीज़, तो कभी किसी का नाम हैं
रो रही हैं जनता, रोना ही बस काम हैं 

रो रहे हैं हम, क्यु बाड़ हैं इत्ती आई
रो रहे हैं हम, क्यों सूखे ने जान खाई 
रोये थे क्या तबभी, जब पेड़ो को काटा था,
रोये थे क्या तबभी, जब तालाबों को बहाया था,

क्यों रोती ये जनता, क्या रोना ही अब काम हैं 
कभी कोई चीज़, तो कभी किसी का नाम हैं
रो रही हैं जनता, रोना ही बस काम हैं 

रोते हैं हम जब, इज़्ज़त किसी की लुटती हैं
रोते हैं हम जब, सजा वो नेता पाता हैं
क्या रोये थे हम, जब इज़्ज़त किसी की छेड़ी थी
क्या रोये थे हम, जब चोर नेता को जिताया था

क्यों रोती ये जनता, क्या रोना ही अब काम हैं 
कभी कोई चीज़, तो कभी किसी का नाम हैं
रो रही हैं जनता, रोना ही बस काम हैं 

रोते हैं सब तब, जब मांगे कोई घूंस हैं 
रोते है सब तब, जब चोरी कुछ हो जाता हैं 
क्या रोये थे तब, जब दहेज़ हमने माँगा था 
क्या रोये थे तब, कला धन छुपाया था 

क्यों रोती ये जनता, क्या रोना ही अब काम हैं 
कभी कोई चीज़, तो कभी किसी का नाम हैं
रो रही हैं जनता, रोना ही बस काम हैं 

Friday, June 13, 2014

वो !!

एक रात की उमीद हैं मेरी, तेरी याद 
एक सुबह का ख़्वाब, तेरा साथ,
सोचा करू तुझको तो ख़ुशी हैं तेरा नाम 
देखलु तुझे तो ज़िंदगी तेरी बात

पूछे तुझे तो खुलती हैं आँखे।   
चाहुँ तुझे तो चलती हैं साँसे 
साथ तेरा धड़कन बन जाती है 
शाया तेरा मेरी रूह बन जाती हैं 

वो !!

Tuesday, June 3, 2014

फुटपाथ !

एक फुटपाथ का वो छोटा सा कोना,
जंहा कभी उसने सुरु किया था रोना 
दिन में जो थाल बनती, और रात में बिस्तर 
जिसपे खुद जीना सीखा उसने आँशु पीकर 
आज वो फुटपाथ बिक गयी हैं,
ज़िंदगी फिर से उसी मोड़ रुक गयी है 
एक वो थे जिन्होने मोल न समझा था उसका 
और एक वो है जो आज मोल लगा रहे उसका 

Friday, May 30, 2014

ख्वाहिशों की दौड़ में, ज़ज़्बात खो गए
मंज़िलों की फ़िक्र में, राह छूट गए 
मशगूल थे जुटाने को ज़िंदगी हम, और  
मुख्तलिफ सी ज़िंदगी, आँखे बंद ज़ी गए ।

Tuesday, May 13, 2014

ऐ राही !!

राह में बैठा क्या सोचे राही, राह कहां ये जांनीं हैँ।
जो तू सोचे राह चलेगी, ये चाह तेरि बैमानि हैँ ।
मंज़िल से क्यो दूर खड़ा तु, मंज़िल खुद न आनीं हैँ ।
जो पग को तु सफ़र बनाले, मंज़िल तुझको पानि हैँ।