Friday, March 14, 2014

क्यो साल यंहा मुझे होली खेलनी नहीं!

क्यो साल यंहा मुझे होली खेलनी नहीं!

चुनावो में रंगा  हैं ये देश, पर रंग किसीका मिलता नहीं
कौन सच्चा, कौन झूठा  भेद किसीका खुलता नहीं 
बैठ चौराहो पे देदे धरना, पर बात कोई सुनता ही नहीं 
वादे तो बहुत हैं उनके, पूरा किसीका होता नहीं। 

क्यो साल यंहा मुझे होली खेलनी नहीं!

कर रहा देश का नाम कोई, कोई बदनामी से डरता नहीं,
सम्मान जिसका लुट चूका था, बात उसकी कोई सुनता नहीं 
मरना तो था जिन्हे सीमाओ पे, घरो में वो बचते ही नहीं 
बेच खाया देश को, वो गद्दार क्यों मरते नहीं,

क्यो साल यंहा मुझे होली खेलनी नहीं!

क्या है ये धर्म उसका, खुद का कोई देखता नहीं,
क्या है ईश्वर, क्या है अल्लाह, जनता उसको ही नहीं,
मांगते हैं सब ही उससे, मानता उसकि ही नहीं,
मर चुको को पूछते हैं, जिन्दो को कोई पूछता ही नही  

क्यो साल यंहा मुझे होली खेलनी नहीं!

वैसे तो बहाने बहुत हैं पास मेरे 
रंगों में रंग अब घुलता नहीं 
एक भाई दुसरे से मिलता नहीं 
मिलते हैं तन, मन मिलते ही नहीं 
रंगों से सजी ज़िन्दगी, बेरंग जहाँन देखता नहीं 
क्यो साल यंहा मुझे होली खेलनी नहीं!
क्यो साल यंहा मुझे होली खेलनी नहीं!

Monday, February 24, 2014

चाह

तश्वीर देख उसे तोड़ देते हैं, मंज़िल मिले तो राह मोड़ देते हैं।
मुकम्मल नहीं वो खयालात हो, मंज़िल वो जिससे न मुलाकात हो।
खयालो में रहना सुकून देता हैं, नयी राहे बनाना जुनून देता हैं।
अधूरा रखना चाहता हूँ खुदको, वो मुझे ज़िंदा रहने कि चाह देता हैं।

Thursday, December 19, 2013

बुलबुले .....!!!!

उगते हैं बुलबुले आज हवाओ में,
खिलते हैं बुलबुले आज घटाओ में,
बनाके आँधी सी ये सूरत, घुल रहे फिजाओ में है।

मन में सबके ये भरे थे, बुलबुले जो खिल रहे,
देख बढ़ता दुसरो को, बुलबुले ये छोड़ते,
बुलबुलो में जो भरा है, वो हवा पुरानी हैं,
मान इनको मोती सा, पास रखना नादानी हैं।

उगते हैं बुलबुले आज हवाओ में,
खिलते हैं बुलबुले आज घटाओ में,
बनाके आँधी सी ये सूरत, घुल रहे फिजाओ में है।

नाम और बदनाम के, सुबह और शाम के
इस वतन के वास्ते, उस वतन के बुलबुले
बात और विचार के, अपने शिष्टाचार के,
गोलियों और तोप से भी बने थे बुलबुले

उगते हैं बुलबुले आज हवाओ में,
खिलते हैं बुलबुले आज घटाओ में,
बनाके आँधी सी ये सूरत, घुल रहे फिजाओ में है।

बुलबुला इक युं उगा था, देश को बदलने का,
क्या पता था बुलबुलो को बैठे तीरंदाज़ थे,
हर बुलबुले का हाल हैं वो, जैसे पैर के धूल का,
पर बुलबुले जो घुल चुके, वो फ़िज़ा में खिल रहे।

 उगते हैं बुलबुले आज हवाओ में,
खिलते हैं बुलबुले आज घटाओ में,
बनाके आँधी सी ये सूरत, घुल रहे फिजाओ में है।

बुलबुले तो बुलबुले हैं, बस पल दो पल का साथ था। 

Sunday, November 24, 2013

"तन्हाई"

आज फिर मुझे याद आयी, अपने बिछड़े यार कि,
आज फिर मुझे एह्सास हुआ, उससे अपने साथ कि,
एक अर्सा साथ गुजारा था, फिर पास उसे बुलाया हैं 
दोस्तों कि भीड़ में, "तन्हाई" नाम उसने बनाया हैं.


Saturday, November 23, 2013

जिंदगी कि दास्तां

लिखा था किसी ने लहू से, रेत पे जिंदगी कि दास्तां 
भूल गया था वो फितरत, रेत और वक़्त का बदलना
लिखा तो था दर्द दिल का, पर खुशियों  ने जगह लेली
पाये थे  जंहा काँटों के निशा, फूलो को सींचा लहू से था 

Sunday, November 17, 2013

आहिस्ता आहिस्ता। ....

कभी भूली बिसरी यादो में,
कभी बिखरे से जज़बातो में,
कभी आँखों के किसी कोने में,
पर अक्सर लम्हे वो चले आते हैं। 

हम लेटा करते थे ज़मी पे,
तारो को आसमा से लाने को। 
आवारा घूमते बादलो से,
पानी निचोड़ लाने को। 

पल दो पल में पाना चाहा था,
हर ख़ुशी हर अर्मान को। 
ज़िंदगी में रफ़्तार को,
फिर मौत के फर्मान को। 

सोचते थे है सब हममें,
कुछ कर दिखने को। 
डरते नहीं थे आंधियो से,
आसमां को चीर जाने को। 

पर ज़िंदगी को प्यार था शायद,
प्यार था उसे मुझसे बेइंतहा 
मुझमे जो समां गयी चुपके से 
कि अब जी रहा हूँ मै उसको,

आहिस्ता आहिस्ता। ....  

Tuesday, September 17, 2013

निर्माण

कर रहे निर्माण हम देश के भविष्य का।
कर रहे निर्माण हम देश के भविष्य का।
देश को ही बेच कर कर रहे निर्माण हैं
देश को ही लूट कर कर रहे निर्माण हैं

बाटते हैं जमी को, बाटते इंसान हैं
ज्ञान और धर्म को, बाटते अज्ञान से।
धर्म को ना मानते, बाटते ये जात हैं
कोई ऊँचा कोई नींचा, बाटते सम्मान हैं।

कर रहे निर्माण हम देश के भविष्य का।
कर रहे निर्माण हम देश के भविष्य का।

लुट गई है आबरू, लुट गया इमान हैं,
औरते जूती है पैर की, नर को नर का दर्प है ।
देवियों को पूजता, पत्थरों का सम्मान हैं
जिंदा है जो वो नारी, उसकी ज़िन्दगी नर्क हैं।

कर रहे निर्माण हम देश के भविष्य का।
कर रहे निर्माण हम देश के भविष्य का।

कहने को तो चाँद पे जाने को तैयार हैं
ये ज़मी को खो रहे, इसका ना हीं ज्ञान हैं
आज को तो खो रहे, कल से हैं अनभिज्ञ भी
पूर्वजो ने जो किया, उसका पर अभिमान हैं

 कर रहे निर्माण हम देश के भविष्य का।
कर रहे निर्माण हम देश के भविष्य का।