Friday, May 30, 2014

ख्वाहिशों की दौड़ में, ज़ज़्बात खो गए
मंज़िलों की फ़िक्र में, राह छूट गए 
मशगूल थे जुटाने को ज़िंदगी हम, और  
मुख्तलिफ सी ज़िंदगी, आँखे बंद ज़ी गए ।

Tuesday, May 13, 2014

ऐ राही !!

राह में बैठा क्या सोचे राही, राह कहां ये जांनीं हैँ।
जो तू सोचे राह चलेगी, ये चाह तेरि बैमानि हैँ ।
मंज़िल से क्यो दूर खड़ा तु, मंज़िल खुद न आनीं हैँ ।
जो पग को तु सफ़र बनाले, मंज़िल तुझको पानि हैँ।


Sunday, May 11, 2014

एह्शास

एक लाश पड़ी देखि मैने आज,
काडी धुप मे तड़प्ते।
जान तो नहि थी उसमे
पर आँखे जैसे बोलना चाहती।
एक पल पहले हि देखा था उसको
खुश था ज़िंदगी से शायद
पर जाने कौन सा गम था
मार गया उसको लम्हों मे ।
अगले ही पल हैरान खड़ा
मै लाश ढ़ूंढ रहा था
दफना दिया था उसको
मेरे वक़्त ने आगे बढ़कर
अब तो याद भी नहि
कितनो को तो मैंने खुद
क़त्ल किया हैं हर रोज़ ।






Friday, March 14, 2014

क्यो साल यंहा मुझे होली खेलनी नहीं!

क्यो साल यंहा मुझे होली खेलनी नहीं!

चुनावो में रंगा  हैं ये देश, पर रंग किसीका मिलता नहीं
कौन सच्चा, कौन झूठा  भेद किसीका खुलता नहीं 
बैठ चौराहो पे देदे धरना, पर बात कोई सुनता ही नहीं 
वादे तो बहुत हैं उनके, पूरा किसीका होता नहीं। 

क्यो साल यंहा मुझे होली खेलनी नहीं!

कर रहा देश का नाम कोई, कोई बदनामी से डरता नहीं,
सम्मान जिसका लुट चूका था, बात उसकी कोई सुनता नहीं 
मरना तो था जिन्हे सीमाओ पे, घरो में वो बचते ही नहीं 
बेच खाया देश को, वो गद्दार क्यों मरते नहीं,

क्यो साल यंहा मुझे होली खेलनी नहीं!

क्या है ये धर्म उसका, खुद का कोई देखता नहीं,
क्या है ईश्वर, क्या है अल्लाह, जनता उसको ही नहीं,
मांगते हैं सब ही उससे, मानता उसकि ही नहीं,
मर चुको को पूछते हैं, जिन्दो को कोई पूछता ही नही  

क्यो साल यंहा मुझे होली खेलनी नहीं!

वैसे तो बहाने बहुत हैं पास मेरे 
रंगों में रंग अब घुलता नहीं 
एक भाई दुसरे से मिलता नहीं 
मिलते हैं तन, मन मिलते ही नहीं 
रंगों से सजी ज़िन्दगी, बेरंग जहाँन देखता नहीं 
क्यो साल यंहा मुझे होली खेलनी नहीं!
क्यो साल यंहा मुझे होली खेलनी नहीं!

Monday, February 24, 2014

चाह

तश्वीर देख उसे तोड़ देते हैं, मंज़िल मिले तो राह मोड़ देते हैं।
मुकम्मल नहीं वो खयालात हो, मंज़िल वो जिससे न मुलाकात हो।
खयालो में रहना सुकून देता हैं, नयी राहे बनाना जुनून देता हैं।
अधूरा रखना चाहता हूँ खुदको, वो मुझे ज़िंदा रहने कि चाह देता हैं।

Thursday, December 19, 2013

बुलबुले .....!!!!

उगते हैं बुलबुले आज हवाओ में,
खिलते हैं बुलबुले आज घटाओ में,
बनाके आँधी सी ये सूरत, घुल रहे फिजाओ में है।

मन में सबके ये भरे थे, बुलबुले जो खिल रहे,
देख बढ़ता दुसरो को, बुलबुले ये छोड़ते,
बुलबुलो में जो भरा है, वो हवा पुरानी हैं,
मान इनको मोती सा, पास रखना नादानी हैं।

उगते हैं बुलबुले आज हवाओ में,
खिलते हैं बुलबुले आज घटाओ में,
बनाके आँधी सी ये सूरत, घुल रहे फिजाओ में है।

नाम और बदनाम के, सुबह और शाम के
इस वतन के वास्ते, उस वतन के बुलबुले
बात और विचार के, अपने शिष्टाचार के,
गोलियों और तोप से भी बने थे बुलबुले

उगते हैं बुलबुले आज हवाओ में,
खिलते हैं बुलबुले आज घटाओ में,
बनाके आँधी सी ये सूरत, घुल रहे फिजाओ में है।

बुलबुला इक युं उगा था, देश को बदलने का,
क्या पता था बुलबुलो को बैठे तीरंदाज़ थे,
हर बुलबुले का हाल हैं वो, जैसे पैर के धूल का,
पर बुलबुले जो घुल चुके, वो फ़िज़ा में खिल रहे।

 उगते हैं बुलबुले आज हवाओ में,
खिलते हैं बुलबुले आज घटाओ में,
बनाके आँधी सी ये सूरत, घुल रहे फिजाओ में है।

बुलबुले तो बुलबुले हैं, बस पल दो पल का साथ था। 

Sunday, November 24, 2013

"तन्हाई"

आज फिर मुझे याद आयी, अपने बिछड़े यार कि,
आज फिर मुझे एह्सास हुआ, उससे अपने साथ कि,
एक अर्सा साथ गुजारा था, फिर पास उसे बुलाया हैं 
दोस्तों कि भीड़ में, "तन्हाई" नाम उसने बनाया हैं.